पोलैंड में न्यायपालिका को लेकर सियासी टकराव, सरकार के फैसले के खिलाफ प्रदर्शन
वारसॉ। यूरोपीय देश पोलैंड में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों को लेकर सरकार तथा विपक्ष के बीच टकराव गहरा गया है। प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार ने संवैधानिक न्यायाधिकरण (Constitutional Tribunal) के अध्यक्ष बोगदान स्विएनचकोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्तलोमिए सोचान्स्की को एक महीने के लिए निलंबित कर दिया है। सरकार के इस फैसले के बाद देश में राजनीतिक तनाव बढ़ गया है। विपक्षी दलों ने इसे न्यायपालिका पर राजनीतिक कब्जे की कोशिश बताते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं, जबकि प्रधानमंत्री टस्क ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि न्यायिक स्वतंत्रता और कानून का शासन बहाल करने के लिए निर्णायक कदम उठाना जरूरी है।
कोर्ट के बाहर प्रदर्शन, पुलिस से टकराव
सरकार के फैसले के विरोध में राजधानी वारसॉ स्थित संवैधानिक न्यायाधिकरण के मुख्यालय के बाहर सैकड़ों लोग एकत्र हुए। प्रदर्शनकारियों में विपक्षी लॉ एंड जस्टिस (PiS) पार्टी के समर्थक और दक्षिणपंथी संगठनों के कार्यकर्ता शामिल थे। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने पुलिस सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश की और अधिकारियों पर वस्तुएं फेंकीं। स्थिति बिगड़ने पर दंगा नियंत्रण पुलिस तैनात की गई। पुलिस के मुताबिक शुक्रवार रात हुई घटनाओं के सिलसिले में तीन प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।
प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री टस्क के खिलाफ नारेबाजी करते हुए आरोप लगाया कि सरकार संवैधानिक संस्थाओं को अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास कर रही है। वहीं सरकार समर्थकों का कहना है कि न्यायाधिकरण को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना और उसकी निष्पक्षता बहाल करना जरूरी है।
प्रधानमंत्री टस्क ने फैसले को बताया जरूरी
प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने सोशल मीडिया पर कहा कि कानून का शासन बहाल करना उनकी सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती लॉ एंड जस्टिस पार्टी की सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमजोर हुई थी। टस्क के अनुसार, वर्तमान सरकार द्वारा किए जा रहे सुधारों की प्रक्रिया कठिन और कभी-कभी विवादास्पद हो सकती है, लेकिन न्यायिक व्यवस्था को सामान्य स्थिति में लाने के लिए निर्णायक कार्रवाई आवश्यक है।
सरकार का आरोप है कि निलंबित न्यायाधिकरण अध्यक्ष ने संसद द्वारा निर्वाचित पांच नए न्यायाधीशों को कार्यभार संभालने से रोकने में भूमिका निभाई और न्यायालय के कामकाज को बाधित किया। इसी आधार पर सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई का समर्थन किया है।
राष्ट्रपति ने बीच में छोड़ा विदेश दौरा
इस विवाद ने पोलैंड के राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की और प्रधानमंत्री टस्क के बीच भी टकराव बढ़ा दिया है। राष्ट्रपति नावरोत्स्की ने सरकार के कदम को संवैधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बताया है। विवाद बढ़ने पर उन्होंने सेनेगल की अपनी यात्रा बीच में ही समाप्त कर दी और वारसॉ लौट आए। इसके बाद वह संवैधानिक न्यायाधिकरण पहुंचे और निलंबित अध्यक्ष बोगदान स्विएनचकोव्स्की से मुलाकात की।
राष्ट्रपति ने राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को बातचीत के लिए आमंत्रित किया, ताकि बढ़ते संवैधानिक संकट का समाधान निकाला जा सके। हालांकि, प्रधानमंत्री टस्क की सत्तारूढ़ सिविक कोएलिशन ने इन बैठकों में हिस्सा नहीं लिया। अब तक बातचीत से कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है।
2015 से जारी है न्यायपालिका पर विवाद
पोलैंड में न्यायपालिका को लेकर मौजूदा विवाद की जड़ें वर्ष 2015 तक जाती हैं। उस समय सत्ता में आई लॉ एंड जस्टिस पार्टी ने न्यायिक नियुक्तियों और अदालतों की संरचना में कई बदलाव किए थे। इन बदलावों पर देश के भीतर और यूरोपीय संघ में सवाल उठे थे। यूरोपीय न्यायालयों ने भी कुछ न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया पर आपत्ति जताई थी और संवैधानिक न्यायाधिकरण की स्वतंत्रता को लेकर चिंता व्यक्त की थी।
वर्ष 2023 में सत्ता में आई डोनाल्ड टस्क की यूरोप समर्थक सरकार ने न्यायपालिका में सुधार और न्यायिक स्वतंत्रता बहाल करने का वादा किया था। लेकिन राष्ट्रपति और न्यायिक संस्थाओं के साथ मतभेदों के कारण इन सुधारों को लागू करने में लगातार बाधाएं आती रही हैं। राष्ट्रपति ने संसद द्वारा चुने गए पांच न्यायाधीशों को शपथ दिलाने से इनकार किया है, जबकि सरकार उन्हें वैध नियुक्तियां मानती है।
यूरोपीय संघ ने भी जताई चिंता
पोलैंड में बढ़ते संवैधानिक विवाद पर यूरोपीय आयोग ने भी चिंता जताई है। आयोग ने राष्ट्रपति से नए न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का आग्रह किया है। वहीं अमेरिका के पोलैंड में राजदूत ने सभी राजनीतिक पक्षों से संयम बरतने की अपील की है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद केवल न्यायाधिकरण के अध्यक्ष के निलंबन तक सीमित नहीं है, बल्कि देश में न्यायपालिका की स्वतंत्रता, सरकार की शक्तियों और राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका से जुड़ा व्यापक संघर्ष है। अगले वर्ष होने वाले संसदीय चुनाव से पहले इस टकराव के और गहराने की आशंका है। फिलहाल पूरे यूरोप की नजर पोलैंड के घटनाक्रम पर टिकी हुई है।